रुद्रपुर में दयालुतापूर्ण (मानवीय) स्ट्रीट डॉग जनसंख्या प्रबंधन की ऐतिहासिक सफलता: 95 प्रतिशत स्ट्रीट डॉग की नसबंदी

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KASHIPUR SAMAY NEWS

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ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया और रुद्रपुर नगर निगम की संयुक्त पहल
ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया ने रुद्रपुर नगर निगम के सहयोग से मात्र 19 महीनों में 5,500 से अधिक स्ट्रीट डॉग की नसबंदी और रेबीज के विरुद्ध टीकाकरण सफलतापूर्वक किया है।


राष्ट्रीय संदर्भ में रुद्रपुर की उपलब्धि
रुद्रपुर, उत्तराखंड (10 फरवरी, 2026):
देश में दयालुतापूर्ण (मानवीय) स्ट्रीट डॉग जनसंख्या प्रबंधन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही चर्चाओं के बीच, रुद्रपुर की यह उपलब्धि यह स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि वैज्ञानिक और दयालुतापूर्ण हस्तक्षेप किस प्रकार ठोस और स्थायी परिणाम दे सकते हैं। तृतीय-पक्ष सर्वेक्षण के अनुसार, ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया और रुद्रपुर नगर निगम के संयुक्त प्रयासों से शहर की कुल स्ट्रीट डॉग आबादी का 95.3 प्रतिशत नसबंदी और टीकाकरण किया गया है, जो लगभग 5,500 स्ट्रीट डॉग हैं। यह आंकड़ा कार्यक्रम के समझौता ज्ञापन (एमओयू) में निर्धारित 80 प्रतिशत लक्ष्य से कहीं अधिक है। अब इस कार्यक्रम का औपचारिक संचालन रुद्रपुर नगर निगम को सौंपा जाएगा।


एबीसी कार्यक्रम का उद्देश्य और दृष्टिकोण
वर्ष 2024 में शुरू किया गया रुद्रपुर का पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) कार्यक्रम मानव–स्ट्रीट डॉग संघर्ष को कम करने, रेबीज के जोखिम को घटाने तथा अनचाहे पिल्लों के जन्म को रोकने पर केंद्रित था। यह पहल भारत भर में मानवीय स्ट्रीट डॉग जनसंख्या प्रबंधन को बढ़ावा देने के ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स के व्यापक मिशन के अनुरूप है।


विशेषज्ञ की प्रतिक्रिया
ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया के स्ट्रीट डॉग कार्यक्रम के निदेशक डॉ. पीयूष पटेल ने कहा:
“रुद्रपुर इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि जब कोई शहर संघर्ष के बजाय करुणा और प्रतिक्रिया के बजाय रोकथाम को प्राथमिकता देता है, तो क्या हासिल किया जा सकता है। प्रभावी योजना, प्रोटोकॉल के प्रति शून्य समझौता और मानक संचालन प्रक्रियाओं के कड़ाई से पालन के कारण हम यह लक्ष्य मात्र 19 महीनों में, निर्धारित समय-सीमा से छह महीने पहले प्राप्त कर सके। निरंतर एबीसी कार्यक्रम के बिना कोई भी अल्पकालिक हस्तक्षेप समस्या का समाधान नहीं करता, बल्कि केवल उसे अस्थायी रूप से टालता है। एबीसी कार्यक्रम, जब सही तरीके से, व्यवस्थित रूप से और पारदर्शिता के साथ लागू किया जाता है, तो निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम देता है और स्ट्रीट डॉग की आबादी को नियंत्रित करता है। इसके परिणाम तुरंत दिखाई नहीं देते, लेकिन वे सुनिश्चित होते हैं।”


सामुदायिक सहभागिता की भूमिका
कार्यक्रम की सफलता में मजबूत सामुदायिक सहभागिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संगठन की सारांश रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 800 स्ट्रीट डॉग (करीब 17 प्रतिशत) को स्थानीय समुदाय के सदस्यों के सक्रिय सहयोग और भागीदारी से पकड़ा गया और उपचारित किया गया। यह तथ्य नागरिकों के बीच बढ़ते विश्वास और सहयोग को दर्शाता है, जो प्रभावी स्ट्रीट डॉग जनसंख्या प्रबंधन के लिए अत्यंत आवश्यक है।


जागरूकता, शिक्षा और नागरिक संवाद
शल्य चिकित्सा हस्तक्षेपों के साथ-साथ, जागरूकता और शिक्षा भी कार्यक्रम का एक प्रमुख हिस्सा रहे। टीम ने स्ट्रीट डॉग के काटने की घटनाओं, संदिग्ध रेबीज मामलों और स्थानांतरण से जुड़े लगभग 300 नागरिक प्रश्नों का समाधान किया। सामुदायिक आउटरीच गतिविधियों में मानव और स्ट्रीट डॉग के बीच सुरक्षित सहअस्तित्व पर स्कूल कार्यक्रम, कानूनी ढांचे और नियमों पर जागरूकता और संदिग्ध रेबीज मामलों को संभालने की मानक प्रक्रियाओं पर प्रशिक्षण शामिल था।


स्वतंत्र मूल्यांकन और आधिकारिक पुष्टि
उत्तराखंड पशु कल्याण बोर्ड के निर्देश पर शहर के 21 विभिन्न क्षेत्रों में कार्यक्रम का स्वतंत्र मूल्यांकन किया गया। उधम सिंह नगर के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. आशुतोष जोशी ने बताया:
“सर्वेक्षण से यह पुष्टि हुई है कि शहर की कुल स्ट्रीट डॉग आबादी में से 95.31 प्रतिशत की शल्य चिकित्सा द्वारा नसबंदी की गई, कृमिनाशन किया गया है तथा एबीसी नियमों के अनुसार रेबीज के विरुद्ध टीकाकरण किया गया है।”


तथ्य
ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया ने स्थानीय समुदायों और नगर निकायों के साथ मिलकर भारत के कई शहरों में उच्च कवरेज वाले एबीसी कार्यक्रम सफलतापूर्वक लागू किए हैं।


उत्तराखंड में, रुद्रपुर के अतिरिक्त देहरादून में 89 प्रतिशत, नैनीताल में 99 प्रतिशत और मसूरी में 92 प्रतिशत स्ट्रीट डॉग की नसबंदी की जा चुकी है।


पूरे भारत में अनुमानित 7.5 करोड़ स्ट्रीट डॉग रहते हैं। सड़कों पर जन्म लेने वाले अधिकांश पिल्ले 12 महीने की आयु तक जीवित नहीं रह पाते।


पशु चिकित्सा सुविधाओं की कमी के कारण स्ट्रीट डॉग रेबीज और अन्य बीमारियों से मर सकते हैं या ऐसी गंभीर चोटों के साथ जीवन जीने को मजबूर हो सकते हैं, जिनका समय पर इलाज संभव था।


जब किसी समुदाय में स्ट्रीट डॉग की संख्या उनकी देखभाल की क्षमता से अधिक हो जाती है, तो कुपोषण की स्थिति उत्पन्न हो सकती है और भय व गलत धारणाओं के कारण उन पर पत्थर फेंकने जैसे क्रूर व्यवहार की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं।

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